नदी बोली समन्दर से | Kunwar Bechain

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ। मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।। मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा मन न लहराया मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया। बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।। मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका। मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।। पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल। पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ। --कुँवर बेचैन  

छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की || chhuk chhuk rail chali hai jeevan ki


छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की
हँसना  रोना जागना सोना खोना पाना सुख दुःख सुख दुःख

छोटी छोटी सी बात से लेकर मोटी मोटी ख़बरों तक
ये गाड़ी ले जाएगी हमको माँ की गोद से कब्रों तक
सब चिल्लाते रह जायेंगे रुक रुक रुक रुक
छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की

सामं बाँध के रखो लेकिन चोरों से होशियार रहो
जाने कब चलना पड़ जाये चलने को तैयार रहो
जाने कब  शीटी  बज जाये सिग्नल जाये झुक
छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की

पाप और पुण्य की गठरी बाँधें सत्य नगर को जाना है
जीवन नगरी छोड़ के हमको दूर सफर को जाना है
ये भी सोच लें हमने क्या क्या माल  किया है बुक
छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की

रात और दिन इस रेल के डिब्बे और साँसों का इंजन है
उम्र हैं इस गाड़ी के पहिये और चिता स्टेशन है
जैसे दो पटरी हो वैसे साथ चले सुख दुःख
छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की

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