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नदी बोली समन्दर से | Kunwar Bechain

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ। मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।। मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा मन न लहराया मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया। बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।। मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका। मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।। पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल। पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ। --कुँवर बेचैन  

कोरोना.. एक सबक

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बेशक मैं गलत हूँ, पर मैं एक सबक हूँ मैं जीव हूँ, हाँ मैं वो सूक्ष्म जीव हूँ जो था अपने आवास में तुम छेड़ दिये घर को मेरे,मैं उड़ा फिरा आकाश में आकाश में, आवास में और साँस में अब करता हूँ विचरण मैं, यह तो बस शुरुआत है.. हूँ आजाद मैं फैलने को,यूँ मौत का खेल खेलने को क्यों  त्रस्त हुए यूँ देख मुझे,मैं तो बस विनाश का आगाज हूँ बेशक मैं गलत हूँ, पर मैं एक सबक हूँ.. अब रोकना चाह रहे मुझको जब सता रहा हूँ मैं तुझको यह वक्त दिया अब सम्भल जाओ,अपने धरती को मत तड़पाओ यह धरती है इंसानों की,उन जीवो की और प्राणों की जो बसते सब अपने घर हैं मत तोड़ो उनके आवासों को, मत काटो उनके रहवासों को ए इंसान मैं तेरी भूख का परिणाम हूँ  बेशक मैं गलत हूँ, हाँ पर मैं एक सबक हूँ..

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