नदी बोली समन्दर से | Kunwar Bechain

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ। मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।। मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा मन न लहराया मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया। बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।। मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका। मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।। पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल। पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ। --कुँवर बेचैन  

college farewell poem

               

जाने कैसी हलचल है जाने कैसा ये गम है
 
हैं उदास तारीखें और चुप कैलेंडर है
 
मैंने खुद से जब पूछा क्यों उदास मंजर है
 
दिल ये चीख कर बोला आज 18 जुलाई है।

 

तुम्हें मदहोश जो कर दे वो जादू साथ लाया हूँ
 
तुम्हारे चाहने वालों के आँसू साथ लाया हूँ 
मेरे साथियों सौगात देने के लिए तुमको 
पुरानी याद के लम्हों की खुशबु साथ लाया हूँ। 

मैं यहाँ प्यार का हर एक चमन चाहता हूँ 
मैं ज़मज़म गंगा का मिलान चाहता हूँ
रहे साथ हिन्दू मुसलमान मिलकर 
दुआओं में बस मैं यही मांगता हूँ। 

खुद दामन रफू करके लिखता हूँ मैं 
जख्म से गुफ्तगु करके लिखता हूँ मैं 
दर्द गाने को भी हौसला चाहिए
आंसुओं से वजू करके लिखता हूँ मैं। 

अपनी सांसों में आबाद रखना मुझे 
मैं रहूं न रहूँ याद रखना मुझे। 




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