नदी बोली समन्दर से | Kunwar Bechain

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ। मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।। मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा मन न लहराया मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया। बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।। मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका। मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।। पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल। पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ। --कुँवर बेचैन  

बोल जमूरे बोल तेरे लव पे क्यों ताला है।

Hindi moral-inspiring story | inklab | इंकलाब

अंधियारों ने ग्रहण रख लिया,थोड़ा तो उजाला है
बोल जमूरे बोल तेरे लव पे क्यों ताला है।

जिनको जिम्मेदार बनाया वो सब डांकू निकले
सारे कौए ओढ़ के खद्दर आज बन गए बगुले
ससंद से पंचायत तक सब गड़बड़ झाला है
 बोल जमूरे बोल तेरे लव पे क्यों ताला है।


कुर्सी है आराध्य देव और दिल्ली तीर्थ धाम 
बढ़ते हैं अब दाम रोज पर गायें राम का नाम 
छीन लिया मुख से गरीब के आज निवाला है 
बोल जमूरे बोल तेरे लव पे क्यों ताला है।


कैसा प्रजातंत्र है अपना कैसी ये आजादी 
स्वार्थ के भक्तों भावी पीढ़ी दांव लगा दी 
सिसक सिसक कर रोता पर्वतराज हिमाला है 
बोल जमूरे बोल तेरे लव पे क्यों ताला है।

 
                                                                                                   --मनीष महावर 

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