नदी बोली समन्दर से | Kunwar Bechain

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ। मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।। मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा मन न लहराया मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया। बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।। मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका। मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।। पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल। पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ। --कुँवर बेचैन  

74 Independence Day


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हम सौंप कर तुमको धरोहर जा रहे खोना नहीं

हम देश पर मरकर अमरता पा रहे रोना नहीं।


वह बीज जो विष वृक्ष बनकर इस धरा पर छा गया

जो मातृभूमि पर गुलामी वाला दाग लगा गया

फिर से कभी जयचंद बनकर तुम उसे बोना नहीं

हम देश पर मरकर अमरता पा  रहे रोना नहीं। 


बिस्मिल सुभाष भगत यहीं सुखदेव और आजाद हैं 

बलिदान की इस भूमि पर हर वीर जिंदाबाद है 

मजबूर या लाचार अब तुमको कभी  होना नहीं

हम देश पर मरकर अमरता पा  रहे रोना नहीं। 


जब स्वार्थ की जागीर पे सारा जहाँ कंगाल हो 

गम के अंधेरों में सना हर आदमी बदहाल हो 

तब गफलतों की नींद में उस वक़्त तुम सोना नहीं  

हम देश पर मरकर अमरता पा  रहे रोना नहीं। 


तुम वीर बालक वीर माता की अटल संतान हो 

तुम पूर्वजों के स्वप्न माँ की गोद के अभिमान हो 

कभी बुजदिली का बोझ अपने शीश पर ढोना नहीं  

हम देश पर मरकर अमरता पा  रहे रोना नहीं। 

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