नदी बोली समन्दर से | Kunwar Bechain

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ। मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।। मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा मन न लहराया मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया। बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।। मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका। मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।। पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल। पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ। --कुँवर बेचैन  

75th Independence Day, मातृभूमि को नमन है......



आन बान शान और स्वाभिमान की मशाल क्रांति चेतना की अंगड़ाई को नमन है काल के कराल भाल जिससे तिलक किया उस पुण्य लहू की ललाई को नमन है झाँसी राजवंश की कमाई को नमन और अमर स्वरों की शहनाई को नमन है चिड़िया से बाज की लड़ाई को नमन रानी लक्ष्मीबाई शौर्य तरुणाई को नमन है जिनके लहू से लाल क्रांति वाला इतिहास जलियाँवाला बाग के शिकारों को नमन है शांति अहिंसा के हथियारों को नमन और क्रांति के गगन के सितारों को नमन है आजादी की डोली के कहारों को नमन और लालाजी के सीने के प्रहारों को नमन है तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा दिल्ली चलो वाली ललकारों को नमन है हमको उजाला देने के लिए जो बुझे उन दीपकों की पावन कतारों को नमन है मातृ वंदना के गीत गाते गाते चूम लिए फाँसी वाले उन पुण्य हारों को को नमन है बलिदानी स्वरों की पुकारों को नमन और कोल्हुओं बही तेलधारों को नमन है क्रांतिकारिओं ने जहाँ लिखा वन्दे मातरम सेल्युलर जेल की दीवारों को नमन है मातृभूमि को दिलाने मुक्ति जो कमाया नाम बलिदानी शौर्य की सच्चाई को नमन है जिसने अमर क्रान्तिज्वाल को जन्म दिया ऐसी पुण्य कोख वाली माई को नमन है इंकलाब जिंदाबाद वाले घोष को नमन आजादी के युद्ध के कन्हाई को नमन है वरमाल की जगह फाँसी को गले में डाला भगत की क्रांति तरुणाई को नमन है

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